Friday, May 16, 2014

होली

मन भर का मन लेके मन मारे मैं चली.

रंगों में डूबी थी जीवन की रंगीनी
रंगरलियों पर आज रंग भारी पड़ते थे
चकराते सर कहीं रंग कहीं भंग देख
विस्मृत दिन रह रहकर मुझे तंग करते थे
होली क्या हो ली मैं तडपी फिर रो चली

निकली अकेली थी मैं कुरते में तंग
तंग किया बच्चों को बूढों को रंग डाला
होली सी जलती इच्छाओं को दिया फूँक
चढ़ती दोपहरी में भंग का चढ़ा प्याला
हँस ले जग हँस ले मैं वैचाली* ही भली

होली की चहक और रंगों की महक बीच
असमंजस अपने पराये की उलझन है
भंग हुई तन्द्रा जब भंग की समझ आया
कुछ अपने भूल गए और कुछ पर बंधन है
उठी, पहन ली मैंने वही हँसी खोखली
मन भर का मन लेके मन मारे मैं चली.

* वैचाली = बावरी

Saturday, May 3, 2014

रक्त

बहता था रक्त और तड़पती हुई थी वो
स्थिर नेत्रों से पथिकों को निहारती, 
देखते तमाशा कुछ खाते तरस लोग 
नीरस हैं या निर्बल किसको पुकारती?

Tuesday, October 9, 2012

स्मृतियाँ


पीछे छूट गईं स्मृतियाँ।

पूछा नाम किसी ने बोले हम पहले खुद पक्का कर लें 
धक्के खा गाड़ी पकड़ी है साँस संभालें ढंग से चढ़ लें 
तोड़ कर स्वर्ण शालाखा आये अब ना पहनेंगे हथकड़ियाँ।

ओ नीली कमीज बाबूजी आगे कौन गाँव पड़ता है 
वैसे आप कहाँ उतरेंगे अपना संग भला लगता है 
आप बिन कठिन सफ़र हो जाता कैसे कट पातीं ये घड़ियाँ?

आप घर बार ठिकाने वाले हम भी कहाँ मेल करते हैं 
ऐसी उलझी पड़ी कहानी पन्ने पलटो तो फटते हैं
मन के तार कट गए जिसके आगे जुड़ें कहाँ से कड़ियाँ? 

अब भी दिखता है घर अपना धूमिल होता सा संध्या में 
मन बहलाने की सब बातें जातीं एक एक कर समिधा में
समय तो हर क्षण ही घटता है, और बढ़ती जाती हैं क्षतियाँ। 

 क्यों न छूट सकीं स्मृतियाँ?

Friday, July 20, 2012

वैतरिणी

तलवार की धार
जब बनी हो आधार
डगमगाएँ तो कैसे?

वैतरिणी पार
है हमारा संसार
कोई आये तो कैसे?

Monday, July 16, 2012

नशा

नशा उतरे ना
ऐसे ही जीवन कट जाए

कहाँ ये अतिसुन्दर स्वप्न
ये परिकल्पनाएं
कहाँ वो सुबह का सर दर्द
दुनिया जब गोल नज़र आये

यहाँ भावनाएं प्रकट कर देने का सुख
वहाँ दुनिया भर की बाधाएँ

क्यों नहीं रुक जाता समय
यहीं, इससे पहले कि सुबह आये

Monday, July 2, 2012

निःशब्द

पीली पुरानी पुस्तकों के पृष्ठ सी
धुँधले पुराने चित्र सी अस्पष्ट सी
अनुभूति उसकी एक क्षण को आई थी
कल रात जब कुछ देर मैं सो पाई थी

क्षण भर लगा कि रातरानी की सुगंध
की जा नहीं सकती कि जो कमरे में बंद
फिर भय मुझे किस बात का लगता रहा
वो साध्य वो आराध्य मेरा था कहाँ?

अविरल नहीं थे अश्रु पर बहते रहे
कुछ नींद से कुछ स्वप्न से लड़ते रहे
मैं थी स्वयं से क्षुब्ध या स्तब्ध थी
उसकी छवि बैठी वहीँ निःशब्द थी.

Sunday, May 20, 2012

कहानी

नई कहानी अंत नया
दुःख जीवन पर्यंत नया
माया को गाली देकर 
उपजा हर दिन संत नया